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जुगनू बन कर मिलता है
एक शख्स मुझे अन्धेरों में,
कभी तन्हाइयों के डेरों में
कभी मुस्काते हुए सवेरों में,
ठहरी हुई ज़िन्दगी में
तो कभी उठती हुई लहरों में !
जब ग़म के बादल छाते हैं
वो साया बन कर आ जाता है,
एक अपना सा वो शख्स लगा
इन अजनबी से चेहरों में,
जीवन की हर मुश्किल राह में
सोचा करती हूँ उसे ही पहरों में !
मैं आसूँ बन कर ढ़ह जाती
गर वो न होता इन गैरों में,
नाम विश्वास बताया करता है
शायद रहता है इन्हीं छोटे मोटे शहरों में !
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