
अंतर्मन में इतनी पीड़ा,आँसू नही निकलते है,
पग पग है दहकते शोले, फिर भी पग नही जलते है।
ज़िद भी ऐसी करके सोये,के अब नही मुझको उठना है,
थक गयी हुँ लड़ कर बहुत, अब बस मुझको सोना है।
दो इतनी हिम्मत हमे के दुःख कुछ मन का कम भी हो,
क्या करे हम इस जीवन का जिस जीवन मे तुम नही हो।
कोई दुआ सुनी ना रब ने, दवा काम ना कर पायी,
ऐसे कैसे छीना सब से, के आखिरी बात तक नही कर पायी।
क्या ही कोशिश थी सबकी, क्या ही सबकी मदद भी थी,
बस तुम्हे हम ठीक कर देंगे, ऐसी झूठी उम्मीद भी थी।
ना दिन देखा, ना देखी रात प्रयास हमारे जारी थे,
जितने भी लगे थे घाव, भरने नही अब वाले थे।
पल पल बढ़ती पीड़ा देख, मोह हमसे छूट गया,
और बिगड़ती हालत देख, मुँह हमारा लटक गया।
लेकर ऐसे गया था मैं, के सबको ठीक कर लाऊँगा,
ओर अपने बड़े भाई की शादी में भी नही जाऊंगा।
कहा उन्हें था कि कैसे भी करके तुम्हे बचाऊंगा,
पता नही था कि तुमको खोकर सबको क्या ही मुँह दिखाऊंगा,
कैसे उनको हिम्मत दूँ जिनको मुझसे हिम्मत थी,
कैसे अब उनको कहूँ के, इतनी ही अपनी किस्मत थी।
साथ लेकर गया था मैं, लाश लेकर आया हूँ,
तुम सांसो से हारी हो, मैं खुद को हार आया हुँ।
मैं शर्मिंदा हुँ क्षमा-प्रार्थी, माफ मुझे तुम कर देना,
प्रभु चरणों से तुम ही सबको जीने की हिम्मत भी दे देना।
मैं शर्मिंदा हुँ क्षमा-प्रार्थी, माफ मुझे तुम कर देना,
प्रभु चरणों से तुम ही सबको जीने की हिम्मत भी दे देना।
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